भारतीय संस्कृति संसद, धर्मतल्ला, कोलकाता ।#ज्ञान चतुर्वेदी ।
धर्मतल्ला कलकत्ता शहर का सम्भवतः सबसे लोकप्रिय और महत्वपूर्ण लोकेशंस में एक है । ठीक मेट्रो स्टेशन के गेट के पास एक सुन्दर, व्यवस्थित संस्कृति सभागार और भवन है ।
बताया गया कि यहाँ हिंदी के लगभग सभी प्रतिष्ठित साहित्यकारों ने वक्तृता दी है । कल पद्मश्री से सम्मानित साहित्यकार डॉ ( मेडिकल) ज्ञान चतुर्वेदी आमंत्रित थे । चतुर्वेदी जी की ख्याति हिन्दी के प्रतिष्ठित व्यंग्य लेखक के रूप में अधिक है । उपन्यास भी इनके इसी शैली में लिखे गए हैं ।
हिंदवी वाले साक्षात्कार में ज्ञान जी कहते हैं कि उन्हें साहित्य अकादेमी सम्मान अब तक नहीं मिला है । यह बात उनके लिए भी सुखद नहीं है और वे स्वयं को इसका अधिकारी मानते हैं । व्यंग्य विधा इससे सम्मानित होगी ।
कल के अपने व्याख्यान में इन्होंने फिर ‘राम राज्य के बहाने पादुका राज’ वाले थीम पर ख़ुद को केंद्रित किया । बहुत ही रोचक ढंग से एक उपन्यास के जन्म की प्रक्रिया को हम पाठकों, श्रोताओं को बताने की कुशल कोशिश की ।
ज्ञान जी सचमुच बड़े हंसमुख स्वभाव के व्यक्ति लगे । मजाक, मजाक में चित्त को वहाँ खींच ले जाते हैं जहाँ हमारा स्वार्थी मस्तिष्क और आत्म मुग्धता में रमा रहने वाला धूर्त मन जाने से ख़ुद को जोर लगाकर रोकता रहता है ।
साहित्यकार प्रियंकर पालीवाल जी फ़िलहाल इसी संस्था में अपनी रचनात्मक भूमिका निभा रहे हैं । उनका ही आमंत्रण था । कल मंच पर वे संचालक की भूमिका में थे । उनके चेहरे पर हमेशा से अलग मुस्कान कम थी । हो सकता है आयोजन के भार का असर हो। बहुत सधे टोन में या कहें बिना पकाये संक्षेप , सूत्र शैली में अपनी बात कहते हुए वे सीधे ज्ञान जी तक हम श्रोताओं को छोड़ना चाहते थे । उनकी इस मंचीय संयम ने मेरा मन मोह लिया । संचालन ऐसा ही होना चाहिए । लोगों को सीखना चाहिए ।
श्रोताओं में पचास के क़रीब लोग थे । ज्यादातर साहित्य लेखक, अध्यापक, संपादक और कला-व्यंग्य प्रेमी । व्याख्यान के बाद आठ दस सवाल भी श्रोता दीर्घा से लिए गए । ज्ञान जी ने व्याख्यान के शुरुआत में ही कहा था कि ‘उनकी पत्नी जी हिदायत देती रहती हैं कि बहका मत करो भाषणों में, न हो तो लिख लिया करो । इस लिए मैं लिख लाया हूँ ।’ पर हिदायत तो हिदायत ही होती है । पेशे से कार्डियोलॉजिस्ट ( हृदय रोग विशेषज्ञ) डॉक्टर साहब की सलाह जब मरीज लोग नहीं सुनते तो मरीजों की सलाह डॉक्टर साहब क्यों सुनें! तो ज्ञान जी बिना देखे ही बोले । घंटा भर बोलकर, श्रोताओं को गदगद करने और थोड़ा और विचारशील रहने में सफल रहे ।
मैंने उनसे मजाकिया अंदाज़ में ही पूछा कि ‘पादुका राज’ में ‘राज सभा अध्यक्ष’ के रूप किसी पात्र को रखने का ख्याल आया था क्या? अकादमिक बुद्धिजीवियों और ब्यूरोक्रेसी विद्वानों की चतुर चुप्पियों और मैनेजिंग स्किल पर वे आलरेडी ठहाके लगवा चुके थे । एक प्रश्न के उत्तर में वे यह भी समझाने की कोशिश करते रहे कि वे या उनका लेखन कहीं से भी स्त्री विरोधी नहीं है । प्रोफेशनल व्यस्तता और लेखन के बीच के संतुलन को भी उन्होंने एक सायास प्रयास का नतीजा माना । और कुछ कुछ ईश्वरीय कृपा । एक अध्यापक साथी ने पूछा कि आप व्यवस्था के विरोध में व्यंग्य लिखते हैं, आपको डर नहीं लगता? ज्ञान जी बोले— व्यवस्था को आपको सुनने की फुर्सत ही कहाँ होती है या आपसे वह डरे ही क्यों? फिर भी कभी कभार स्थिति ऐसी विकट आ ही जाए तो अपनी ‘चतुराई’ किस दिन के लिए है! और सभी हँसे । मेरे एक और सवाल कि आप AI को कैसे देखते हैं, ज्ञान जी बोले अभी Ai को मैं ख़ुद ही समझ नहीं पा रहा हूँ, समझ लूँगा तो एक और उपन्यास लिखना चाहूँगा ।
व्याख्यान और संवाद के बाद हिंदी के प्रतिष्ठित निबंध लेखक कुबेर नाथ राय ग्रंथावली का विमोचन किया गया । मंच पर पालीवाल जी हममें से भी कुछ साथियों को बुला लिया । इस ग्रंथावली के दो संपादक हैं— साहित्यकार अध्यापक डॉ अवधेश प्रधान जी और साहित्य प्रेमी प्रकाशक ( प्रतिश्रुति) लक्ष्मण केडिया जी । मंच पर केवल केडिया जी थे, उन्हें ही सभी ने बधाई दी ।
खाने की बड़ी सुंदर व्यवस्था थी । गर्म पूड़ी, आलू दम, आलू गोभी मटर की सब्जी, दाल, बासमती चावल, दही बड़े, गुलाब जामुन, पापड़ और भी दो चार चीजें । खाना के स्वाद से ऐसा लगा कि खाना आउटसोर्स नहीं किया गया है बल्कि भवन के निजी किचन में शानदार रसोई मास्टरों से तैयार करवाया गया है । पर खाने के व्यंजनों में वेज ज़ोन के महाराजा पनीर जी को न देखकर , खाते खाते सोच में पड़ा रहा । ऐसा लगा कि साहित्य में जैसे कविता विधा का वर्चस्व है, वैसे ही वेज भोजन में पनीर का । तो व्यंग्य विधा के रचनाकार के कार्यक्रम के माध्यम से पनीर की निर्वाध सत्ता को बाहर रखकर, सर्वजन हिताय ( संप्रेष्य सुलभ) आलू (व्यंग्य विधा) से मानो चुनौती दी गई हो ! और यह एक मौलिक प्रतिरोधी विचार है जिसका मुझ जैसे भोजन लोभी को भी स्वागत करना ही चाहिए!😊
खाने का इतना लंबा जिक्र इसलिए कि आजकल साहित्यिक कार्यक्रमों में ख़ान पान की हालत इतनी ख़राब हो चुकी है कि मैंने अपना टिफिन इस दिन भी साथ रखने की आदत बना ली है।
सुना है संस्था के अध्यक्ष मुधडा (८५ वर्षीय) जी कोलकाता के बड़े उद्योगपतियों में गिने जाते हैं । हालांकि वे स्वयं कार्यक्रम में उपस्थित नहीं थे । लेकिन संस्था के उपाध्यक्ष महोदय ने भावुक भाव से धन्यवाद ज्ञापित किया और सभा समाप्त हुई ।